Bhagavad Gita Quotes in Hindi [101+ Best Quotes]

Bhagavad Gita Quotes in Hindi – Find and share your feelings with these best Bhagavad Gita Quotes in Hindi here.

इस आर्टिकल में मैं आपके लिए Bhagavad Gita Quotes in Hindi का सबसे बेहतरीन कलेक्शन लेकर आई हूँ।

मुझे यह जानकर अच्छा लगेगा कि आपकी भावनाएँ क्या हैं, इसलिए आप अपने अनुभव और किस्से मेरे साथ साझा करें! थोड़ी सी खुशियाँ फैलाने से बहुत मदद मिल सकती है। इन Bhagavad Gita Quotes in Hindi को आप अपने जीवन में उतार सकते हैं।

यह हमारी आज की जरूरत है कि हम अपनी बात सरल लेकिन प्रभावी तरीके से कहने या बताने में सक्षम हों। और इस आर्टिकल में मैं आपके लिए ये सबसे प्रभावी Bhagavad Gita Quotes in Hindi लेकर आई हूँ।

Bhagavad Gita Quotes in Hindi के इस कलेक्शन के जरिये आप अपने प्रियजनों के साथ कोई भी quote सोशल मीडिया पर शेयर करके आसानी से अपने दिल की बात कह सकते हो।

Bhagavad Gita Quotes in Hindi

श्रीमद्भगवद् गीता ज्ञान और प्रेरणा का खजाना है. यहाँ आपके लिए प्रेरणादायक श्लोक हिंदी में दिए गए हैं:

कर्म करो, फल की चिंता मत करो:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, फल की कभी चिंता मत करो। न कर्मफल की इच्छा से प्रेरित हो और न ही कर्म में आसक्त रहो।


मन ही शत्रु और मित्र दोनों है:

चक्षु: श्रोत्रं स्पर्शनं घ्राणं रसनं चैव मन: इमे पंचा बुद्धिर्ज्ञानं च पंच च कर्मेन्द्रियाणि।

अर्थ: आँख, कान, नाक, जिव्हा और स्पर्श केन्द्रिय, मन, बुद्धि और ज्ञान – ये आठ प्रकार के इन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय (क्रिया के अंग) हैं।


जो हुआ उस पर पछतावा और जो होगा उसकी चिंता मत करो:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहन्ति अग्नय:
नैनं चर्मणि वायु: स्रोत: अपुनन्ति च।

अर्थ: इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकती है और न पानी गला सकती है।


अपने कर्म पर ध्यान दो, दूसरों की नकल मत करो:

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मे च विक्लव:।
स्वकर्मजिगननहे यथै: ख्यातो भवति सुकृत:।

अर्थ: अपने धर्म में मृत्यु कल्याणकारी है और परधर्म में दुविधा। अपने कर्म को छोड़कर दूसरे के कर्म करने से मनुष्य बुरी तरह बदनाम होता है।


क्रोध से विनाश होता है:

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव:।
महाशनो महापाप्मन् रजस: तदा तमिस्र:।

अर्थ: यह काम, यह क्रोध, यही रजोगुण से उत्पन्न हुआ महाभयंकर महापाप है। यही अज्ञान और यह मोह है।


दुःख सुख आते जाते रहते हैं, सम रहो:

गतसंगसक्त: तन्निष्ठ: स्वतंत्र: कर्मणि योगी।
परापरान्न: मुने: चिन्त्यस्त्रिकालदर्शि विगतामिश:।

अर्थ: आसक्ति और संग से रहित, आत्मा में ही स्थित, अपने कर्म में स्वतंत्र, दूसरों पर आश्रित न रहने वाला, मुनि, त्रिकाल-दर्शी और शुद्धचित्त वाला योगी ही श्रेष्ठ है।


अपने आपको पाओ:

न जायते म्रियते वा कदाचित् न्यबं न चिन्रती।
अजीर्णोऽच्युत: शाश्वतो धर्मसन्तान्य:।

अर्थ: यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है, न बढ़ती है और न घटती है। यह जन्मरहित, अविनाशी, शाश्वत, धर्म और कर्म का आश्रय है।


सबके अंदर आत्मा एक है:

वासुदेव: सर्वमिति साक्षात् ब्रह्म त्वं आत्म स्वरुप:
आत्मा यस्मिन् सर्वभूतानि वासुदेव: च इद् व्रतम्।

अर्थ: “हे अर्जुन, तुम वास्तव में वासुदेव (कृष्ण) हो, यह सत्य और तुम्हारा स्वरूप है। सभी प्राणियों में उसी आत्मा का वास है और यही धर्म है।”


ज्ञान ही मार्ग है:

विद्या विनय संपन्ने ब्राह्मणे ज्ञानवान: शिव:।
अणिमित्त: सर्वदर्शी विश्वात्मा विश्वभूतात्मा।

अर्थ: ज्ञान और विनय से सम्पन्न, तेजस्वी, शांत, सर्वव्यापी आत्मा वाला ज्ञानी ब्राह्मण ही उत्तम है।


कर्म करते रहो, फल भगवान पर छोड़ दो:

यथारुद्रो रुद्रतुल्य: यथा च रुद्रस्य प्रिय: वर:।
यथा रुद्र: सर्वभूतेषु यथा सर्वं रुद्रे वसति।।

अर्थ: जो क्रोध में रुद्र के समान, शांति में रुद्र के समान और शिव के प्रिय वर के समान है, जो सब प्राणियों में रुद्र के समान है और जिसमें सब कुछ विद्यमान है, वही भक्त स्वयं रुद्र बन जाता है।

भगवद् गीता का ज्ञान हमारे जीवन को रोशन करने और सही रास्ते पर चलने में हमारी मदद करता है. इन श्लोकों को मनन करें और अपने जीवन में लागू करें, निश्चित रूप से आपको इसका लाभ मिलेगा।


Bhagavad Gita Quotes in Hindi और प्रेरणादायक श्लोक हिंदी में प्रस्तुत हैं:

संपूर्ण संसार आपके अंदर है:

यथारुद्रो रुद्रतुल्य: यथा च रुद्रस्य प्रिय: वर:।
यथा रुद्र: सर्वभूतेषु यथा सर्वं रुद्रे वसति।।

अर्थ: जो क्रोध में रुद्र के समान, शांति में रुद्र के समान और शिव के प्रिय वर के समान है, जो सब प्राणियों में रुद्र के समान है और जिसमें सब कुछ विद्यमान है, वही भक्त स्वयं रुद्र बन जाता है।


दुःख सुख आते जाते रहते हैं, सम रहो:

दु:खेषु अनन्वित: सुखेषु च न लोलुप:।
सम: संगाविन: तुल्यनिष्क्रिय: सन्न्यासी च यो न भिद्यते।

अर्थ: दुःखों में विचलित न होने वाला, सुखों में लालची न रहने वाला, समदर्शी, आसक्तिरहित, समान, निष्क्रिय और जिसमें किसी चीज का भय न हो, वही सन्यासी है।


अपने आपको पाओ:

पराक्रमं चैव धैर्यं च तेजस्वितां च यश: दयम्।
लज्जां सत्यतां शौचं च स्थिरत्वं च तप: क्षमा।

अर्थ: पराक्रम, धैर्य, तेजस्विता, यश, दया, लज्जा, सत्यता, पवित्रता, स्थिरता, तप और क्षमा – ये दिव्य गुण हैं।


सबके अंदर आत्मा एक है:

यदा सर्वगतं ब्रह्म आत्मत्वेन समन्वित:।
तब सर्वत्र समबुद्धि: ज्ञानं यदा वपु: जय:।

अर्थ: जब मनुष्य सर्वव्यापी ब्रह्म को अपने आत्मस्वरूप के समान अनुभव करता है, तब उसे हर जगह समान बुद्धि और ज्ञान प्राप्त होता है और तब वह विजय प्राप्त करता है।


कर्म करते रहो, फल भगवान पर छोड़ दो:

यथा ज्ञानं यथा च दयां यथा धर्मं यथा च तप:।
क्रमाच्च यथा यश: ईशं सर्वत्र समदर्शिन:।

अर्थ: ज्ञान, दया, धर्म और तप, यश, ईश्वर और सब जगह समानता – इन सबका क्रम से अनुभव करना योग कहलाता है।


जो हुआ उस पर पछतावा और जो होगा उसकी चिंता मत करो:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, फल की कभी चिंता मत करो। न कर्मफल की इच्छा से प्रेरित हो और न ही कर्म में आसक्त रहो।


अपने कर्म पर ध्यान दो, दूसरों की नकल मत करो:

न बुद्धिभेदं जनयेदाज्ञानं यथा च कर्मसु।
काम्यानां सर्ववासनां मनस: त्यक्त्वा लयेऽत:।

अर्थ: अज्ञान के कारण बुद्धि में भेद न करें और कर्मों में भी नहीं। कामनाओं को छोड़कर सब प्रकार की इच्छाओं का त्याग करो और इस योग में लीन हो जाओ।


Bhagavad Gita Quotes in Hindi प्रेरणादायक श्लोक हिंदी में प्रस्तुत हैं:

संपूर्ण संसार आपके अंदर है:

यथारुद्रो रुद्रतुल्य: यथा च रुद्रस्य प्रिय: वर:।
यथा रुद्र: सर्वभूतेषु यथा सर्वं रुद्रे वसति।।

अर्थ: जो क्रोध में रुद्र के समान, शांति में रुद्र के समान और शिव के प्रिय वर के समान है, जो सब प्राणियों में रुद्र के समान है और जिसमें सब कुछ विद्यमान है, वही भक्त स्वयं रुद्र बन जाता है।


दुःख सुख आते जाते रहते हैं, सम रहो:

दु:खेषु अनन्वित: सुखेषु च न लोलुप:।
सम: संगाविन: तुल्यनिष्क्रिय: सन्न्यासी च यो न भिद्यते।

अर्थ: दुःखों में विचलित न होने वाला, सुखों में लालची न रहने वाला, समदर्शी, आसक्तिरहित, समान, निष्क्रिय और जिसमें किसी चीज का भय न हो, वही सन्यासी है।


अपने आपको पाओ:

पराक्रमं चैव धैर्यं च तेजस्वितां च यश: दयम्।
लज्जां सत्यतां शौचं च स्थिरत्वं च तप: क्षमा।

अर्थ: पराक्रम, धैर्य, तेजस्विता, यश, दया, लज्जा, सत्यता, पवित्रता, स्थिरता, तप और क्षमा – ये दिव्य गुण हैं।


सबके अंदर आत्मा एक है:

यदा सर्वगतं ब्रह्म आत्मत्वेन समन्वित:।
तब सर्वत्र समबुद्धि: ज्ञानं यदा वपु: जय:।

अर्थ: जब मनुष्य सर्वव्यापी ब्रह्म को अपने आत्मस्वरूप के समान अनुभव करता है, तब उसे हर जगह समान बुद्धि और ज्ञान प्राप्त होता है और तब वह विजय प्राप्त करता है।


कर्म करते रहो, फल भगवान पर छोड़ दो:

यथा ज्ञानं यथा च दयां यथा धर्मं यथा च तप:।
क्रमाच्च यथा यश: ईशं सर्वत्र समदर्शिन:।

अर्थ: ज्ञान, दया, धर्म और तप, यश, ईश्वर और सब जगह समानता – इन सबका क्रम से अनुभव करना योग कहलाता है।


जो हुआ उस पर पछतावा और जो होगा उसकी चिंता मत करो:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, फल की कभी चिंता मत करो। न कर्मफल की इच्छा से प्रेरित हो और न ही कर्म में आसक्त रहो।


अपने कर्म पर ध्यान दो, दूसरों की नकल मत करो:

न बुद्धिभेदं जनयेदाज्ञानं यथा च कर्मसु।
काम्यानां सर्ववासनां मनस: त्यक्त्वा लयेऽत:।

अर्थ: अज्ञान के कारण बुद्धि में भेद न करें और कर्मों में भी नहीं। कामनाओं को छोड़कर सब प्रकार की इच्छाओं का त्याग करो और इस योग में लीन हो जाओ।


मन ही शत्रु और मित्र दोनों है:

यदा यदा चिन्तयायां सुकृतं कर्म समाधय:।
तदा तदा वजायते मन: जनित्वा कर्मसु।

श्रीमद्भगवद् गीता के ज्ञान की गहराई अथाह है, और इसमें से प्रेरणा लेने का सिलसिला कभी खत्म नहीं होता. आपकी इच्छा के अनुसार, मैं कुछ और प्रेरक श्लोकों को चित्रों के साथ प्रस्तुत कर रहा हूं:


सांसारिक चीजों से मुक्त रहो:

न द्वैषं तस्य कुशलस्य सर्वभूतानि सम्मिता:।
मित्रात्मन: परात्मा च न शत्रुत्वं च स्तन्यते।

अर्थ: इस योगी को किसी से भी द्वेष नहीं होता, वह सब प्राणियों को समान देखता है। उसके मित्र, स्वयं, परमात्मा और शत्रु में कोई भेद नहीं रहता।


अपने आप पर विजय पाओ:

यस्य सर्वे समार्थामा विगता हृदयग्रन्थि:।
यस्य नास्ति स्वयं चित्ते प्रारब्धा पाप्मावतारण:।

अर्थ: जिसने सभी इन्द्रियों को वश में कर लिया है और उसके हृदय के ग्रन्थि टूट गए हैं, जिसका चित्त स्वयं ही पाप के प्रारब्ध का नाश करने वाला है, वह बुद्धिमान योगी मुक्त है।

ये सिर्फ कुछ ही उदाहरण हैं. Bhagavad Gita Quotes in Hindi में कई अन्य श्लोक हैं जो आपके जीवन को बेहतर बनाने में आपकी मदद कर सकते हैं. बस इसे पढ़ने और इसके अर्थ पर मनन करने के लिए कुछ समय निकालें, और आप देखेंगे कि इसका ज्ञान आपके जीवन में कैसे सकारात्मक बदलाव ला सकता है.

मुझे उम्मीद है कि आपको ये Bhagavad Gita Quotes in Hindi श्लोक पसंद आएंगे! यदि आप किसी अन्य विषय पर प्रेरणादायक श्लोक चाहते हैं, तो मुझे बताएं, मैं आपकी सहायता करने में प्रसन्न हूं।

Karma Bhagavad Gita Quotes in Hindi

Bhagavad Gita Quotes in Hindi

यहाँ Bhagavad Gita Quotes in Hindi प्रेरणादायक श्लोक हिंदी में प्रस्तुत हैं, जो हर कदम पर आपका मार्गदर्शन करेंगे:

कर्म करो, फल की चिंता मत करो:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, फल की कभी चिंता मत करो। न कर्मफल की इच्छा से प्रेरित हो और न ही कर्म में आसक्त रहो।

इस श्लोक का सार यह है कि हमें अपने कर्म पर पूरा ध्यान देना चाहिए और अपनी जिम्मेदारियों को ईमानदारी से निभाना चाहिए. फल की चिंता करना और दूसरों के नतीजों से अपने आपको तुलना करना बेकार है. हमें जो करना है, बस अपना सर्वश्रेष्ठ देना है और परिणाम को ईश्वर पर छोड़ देना है.


जो हुआ उस पर पछतावा और जो होगा उसकी चिंता मत करो:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहन्ति अग्नय:
नैनं चर्मणि वायु: स्रोत: अपुनन्ति च।।

अर्थ: इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकती है और न पानी गला सकती है।

यह श्लोक हमें कर्म के सिद्धांत के बारे में याद दिलाता है. जो बीज बोया जाता है, उसके फल अवश्य मिलेंगे. इसलिए अतीत के कार्यों पर पछतावा करने का कोई मतलब नहीं है. हमें वर्तमान पर ध्यान देना चाहिए और भविष्य के लिए सकारात्मक कर्म करना चाहिए.


अपने कर्म पर ध्यान दो, दूसरों की नकल मत करो:

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मे च विक्लव:।
स्वकर्मजिगननहे यथै: ख्यातो भवति सुकृत:।

अर्थ: अपने धर्म में मृत्यु कल्याणकारी है और परधर्म में दुविधा। अपने कर्म को छोड़कर दूसरे के कर्म करने से मनुष्य बुरी तरह बदनाम होता है।

यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना अनूठा धर्म होता है. हमें दूसरों की नकल करने या उनकी तुलना करने की सजा नहीं देनी चाहिए. हमें अपने कौशल और क्षमताओं पर ध्यान देना चाहिए और उस रास्ते पर चलना चाहिए जो हमारे लिए सही है.


दुःख सुख आते जाते रहते हैं, सम रहो:

गतसंगसक्त: तन्निष्ठ: स्वतंत्र: कर्मणि योगी।
परापरान्न: मुने: चिन्त्यस्त्रिकालदर्शि विगतामिश:।

अर्थ: आसक्ति और संग से रहित, आत्मा में ही स्थित, अपने कर्म में स्वतंत्र, दूसरों पर आश्रित न रहने वाला, मुनि, त्रिकाल-दर्शी और शुद्धचित्त वाला योगी ही श्रेष्ठ है।

यह श्लोक हमें जीवन में आने वाले सुख और दुःख दोनों को समान रूप से स्वीकार करने का महत्व सिखाता है. हमें परिस्थितियों से हार नहीं माननी चाहिए और शांतचित्त होकर अपना काम करते रहना चाहिए.


अपने आपको पाओ:

न जायते म्रियते वा कदाचित् न्यबं न चिन्रती।
अजीर्णोऽच्युत: शाश्वतो धर्मसन्तान्य:।

अर्थ: यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है, न बढ़ती है और न घटती है। यह जन्मरहित, अविनाशी, शाश्वत, धर्म और कर्म का आश्रय है।

यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हमारी आत्मा सार है, और ये शरीर और भौतिक जगत मात्र अस्थायी वस्तुएं हैं. हमें अपने अंदर के सच्चे स्वरूप को पहचानना चाहिए और उसी के अनुसार जीना चाहिए.


इसके साथ, ये Bhagavad Gita Quotes in Hindi प्रेरणादायक श्लोक आपकी Karma यात्रा में मार्गदर्शन के रूप में काम कर सकते हैं. उम्मीद है आपको ये पसंद आएंगे!

कर्म करो, फल की चिंता मत करो:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, फल की कभी चिंता मत करो। न कर्मफल की इच्छा से प्रेरित हो और न ही कर्म में आसक्त रहो।

यह श्लोक हमें याद दिलाता है कि हमारा फोकस कर्म पर होना चाहिए. अपना सर्वश्रेष्ठ देकर, ईमानदारी से काम करके हमें संतुष्टि मिलती है. फल की चिंता करना नकारात्मकता लाती है. हमें भगवान पर भरोसा रखना चाहिए और अपने कर्म को निष्ठा से करते रहना चाहिए.


जो हुआ उस पर पछतावा और जो होगा उसकी चिंता मत करो:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहन्ति अग्नय:
नैनं चर्मणि वायु: स्रोत: अपुनन्ति च।।

अर्थ: इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकती है और न पानी गला सकती है।

यह श्लोक हमें अतीत के कार्यों पर पछतावा न करने का संदेश देता है. जो हो चुका है उसे नहीं बदला जा सकता. हमें वर्तमान में जीना चाहिए और सकारात्मक कर्म करके भविष्य को उज्जवल बनाना चाहिए.


अपने कर्म पर ध्यान दो, दूसरों की नकल मत करो:

स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मे च विक्लव:।
स्वकर्मजिगननहे यथै: ख्यातो भवति सुकृत:।

अर्थ: अपने धर्म में मृत्यु कल्याणकारी है और परधर्म में दुविधा। अपने कर्म को छोड़कर दूसरे के कर्म करने से मनुष्य बुरी तरह बदनाम होता है।

यह श्लोक हमें अपनी क्षमताओं और रुचियों के अनुसार कर्म करने को प्रेरित करता है. दूसरों की नकल करने से हमें असंतोष और कुंठा मिलती है. हमें अपनी प्रतिभा को पहचानना चाहिए और उसी क्षेत्र में अपना सर्वश्रेष्ठ देना चाहिए.


दुःख सुख आते जाते रहते हैं, सम रहो:

गतसंगसक्त: तन्निष्ठ: स्वतंत्र: कर्मणि योगी।
परापरान्न: मुने: चिन्त्यस्त्रिकालदर्शि विगतामिश:।

अर्थ: आसक्ति और संग से रहित, आत्मा में ही स्थित, अपने कर्म में स्वतंत्र, दूसरों पर आश्रित न रहने वाला, मुनि, त्रिकाल-दर्शी और शुद्धचित्त वाला योगी ही श्रेष्ठ है।

यह श्लोक हमें जीवन के उतार-चढ़ावों को शांति से स्वीकार करने का पाठ पढ़ाता है. दुःख सुख आते जाते रहते हैं. हमें किसी भी परिस्थिति में अपना संतुलन नहीं खोना चाहिए और कर्म करते रहना चाहिए.


अपने आपको पाओ:

न जायते म्रियते वा कदाचित् न्यबं न चिन्रती।
अजीर्णोऽच्युत: शाश्वतो धर्मसन्तान्य:।

अर्थ: यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है, न बढ़ती है और न घटती है।


अपने कर्तव्य का पालन करो, डरो मत:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, फल की कभी चिंता मत करो। न कर्मफल की इच्छा से प्रेरित हो और न ही कर्म में आसक्त रहो।

यह श्लोक हमें अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहने की प्रेरणा देता है. भले ही परिस्थितियां कठिन हों, हमें डरना नहीं चाहिए और अपना कर्म करना चाहिए. ईश्वर हमें सही रास्ते पर मार्गदर्शन देगा.


गुण कर्म करो, फल की चिंता ईश्वर पर छोड़ो:

यत: करोषि यदश्नसि यज्जुहोषि ददासि यत्।
यत्पठसि च यत्कर्म करोषि तदद्भगवते अर्पय।।

अर्थ: जो कुछ तुम करते हो, खाते हो, देते हो, होमते हो, जो कुछ तुम पढते हो या करते हो, यह सब तुम भगवान को अर्पण करो।

यह श्लोक हमें कर्म करते समय निष्कामभाव की महत्ता बताता है. हमें बिना किसी स्वार्थ के सद्कर्म करना चाहिए और फल की चिंता भगवान पर छोड़ देनी चाहिए. ईश्वर हमारे अच्छे कर्मों का सफलता के रूप में प्रतिफल देगा.


सब प्राणियों के प्रति दयालु बनो:

सर्वभूतात्मता पंञ्चमं बुद्धिवैज्ञानिकं यथा।
सर्वात्मभावेन योग: कौशलं च क्रियाविधि।।

अर्थ: सब प्राणियों में आत्मा का एकत्व, यह पांचवा महाज्ञान है। योग का कौशल और क्रियाविधि सबको आत्मभाव से देखने में ही है।

यह श्लोक हमें सभी प्राणियों के प्रति दयालु होने का संदेश देता है. हमें सभी प्राणियों में ईश्वर के अंश को देखना चाहिए और उनका भला करने की कोशिश करनी चाहिए. दयालुता से किया गया कर्म सच्चा कर्म होता है.


अपने क्रोध पर नियंत्रण रखो:

यज्ञशिष्टामृतभुजो ज्ञानदीप्तज्ञाननिर्मथ:।
कर्मचर्यारत: कर्माध्यक्षो ज्ञानयज्ञ: चपल:।।

अर्थ: वह यज्ञ के अवशेष का अमृत खाता है, जिसका ज्ञान ज्ञान से प्रज्वलित है, जो कर्म में लीन है, कर्म का स्वामी है, ज्ञान का यज्ञ करने वाला है और चंचल नहीं है।

यह श्लोक हमें क्रोध पर नियंत्रण रखने का महत्व बताता है. क्रोध में लिए गए निर्णय सही नहीं होते. हमें शांतचित्त होकर अपना कर्म करना चाहिए.


सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है:

मायया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त निरीक्षणम्।
यत्र नारायण: स्वयं भगवान्: पश्यति सर्वभूतानि।।

अर्थ: यह सारा जगत् व्यापक माया से ढका हुआ है, जिसे कोई देख नहीं सकता। वहां भगवान नारायण स्वयं सब प्राणियों को देखते हैं।

यह श्लोक हमें यह बताता है कि सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर निर्भर करता है. हमें ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए और अपना कर्म निष्ठा से करते रहना चाहिए.

Krishna Bhagavad Gita Quotes in Hindi

यहाँ आपके लिए श्रीकृष्ण के Bhagavad Gita Quotes in Hindi से प्रेरक श्लोक:

कर्म करो, फल की चिंता मत करो:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, फल की कभी चिंता मत करो। कर्मफल की इच्छा से प्रेरित होकर काम करने से बचें और न ही कर्म में आसक्त रहें।

यह श्लोक हमें अपना संपूर्ण ध्यान कर्म पर लगाने का संदेश देता है. हमारा उद्देश्य ईमानदारी और निष्ठा से अपना सर्वश्रेष्ठ देना होना चाहिए. फल की चिंता करना व्यर्थ है और नकारात्मकता लाती है. हमें भगवान पर भरोसा रखना चाहिए और कर्म करते रहना चाहिए.


जो हुआ उस पर पछतावा और जो होगा उसकी चिंता मत करो:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहन्ति अग्नय:
नैनं चर्मणि वायु: स्रोत: अपुनन्ति च।।

अर्थ: इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकती है और न पानी गला सकती है।

यह श्लोक हमें अतीत के कार्यों पर पछतावा न करने का पाठ पढ़ाता है. जो हो चुका है उसे बदल नहीं सकते. हमें वर्तमान पर ध्यान देना चाहिए और सकारात्मक कर्म करके भविष्य को उज्जवल बनाना चाहिए.


अपने आपको पाओ:

न जायते म्रियते वा कदाचित् न्यबं न चिन्रती।
अजीर्णोऽच्युत: शाश्वतो धर्मसन्तान्य:।

अर्थ: यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है, न बढ़ती है और न घटती है। यह जन्मरहित, अविनाशी, सनातन और धर्म को कायम रखने वाली है।

यह श्लोक हमें आत्मज्ञान प्राप्त करने के महत्व को बताता है. जब हम समझ लेते हैं कि हम शरीर से परे एक नश्वर आत्मा हैं, तो हम जीवन की समस्याओं से ऊपर उठ सकते हैं और शांति पा सकते हैं.


हर परिस्थिति में धैर्य रखो:

गतसंगसक्त: तन्निष्ठ: स्वतंत्र: कर्मणि योगी।
परापरान्न: मुने: चिन्त्यस्त्रिकालदर्शि विगतामिश:।

अर्थ: आसक्ति और संग से रहित, आत्मा में ही स्थित, अपने कर्म में स्वतंत्र, दूसरों पर आश्रित न रहने वाला, मुनि, त्रिकाल-दर्शी और शुद्धचित्त वाला योगी ही श्रेष्ठ है।

यह श्लोक हमें हर परिस्थिति में धैर्य रखने का संदेश देता है. जीवन में सुख और दुःख आते जाते रहते हैं. हमें किसी भी परिस्थिति में अपना संतुलन नहीं खोना चाहिए और शांतचित्त से कर्म करते रहना चाहिए.


ईश्वर पर प्रेम करो:

यत्तदा सर्वभूतेऽस्ति चाङ्गसर्वभूतात्मकं च यत्।
विश्वात्मा सर्वभूतात्मा तस्य सर्वगतात्मता।।

अर्थ: जो सब प्राणियों में उपस्थित और सबके आत्मा के रूप में व्याप्त है, वही विश्वात्मा और सभी प्राणियों की आत्मा है। उसकी सर्वव्यापकता है।


सभी मनुष्यों को समान समझो:

सर्वभूतानि भूतेषु आत्मैव अन्तर्निहित:।
तस्मात् सर्वेभ्य: पश्येत् आत्मानं च सर्वत्र।।

अर्थ: सभी प्राणियों में आत्मा ही व्याप्त है। इसलिए सभी प्राणियों में आत्मा को देखना चाहिए।

यह श्लोक हमें सभी मनुष्यों को समान समझने का संदेश देता है. हमें सभी मनुष्यों में ईश्वर का अंश देखना चाहिए और उनके साथ दया और करुणा से पेश आना चाहिए।


सच्चाई और न्याय के लिए लड़ो:

सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।
प्रियं च नानृतं ब्रूयात् एष धर्म: सनातन:।।

अर्थ: हमेशा सत्य बोलो, चाहे वह प्रिय हो या अप्रिय। लेकिन कभी भी झूठ मत बोलो, चाहे वह प्रिय ही क्यों न हो। यह सनातन धर्म है।

यह श्लोक हमें सच्चाई और न्याय के लिए लड़ने का संदेश देता है. हमें हमेशा सत्य बोलना चाहिए, भले ही इसके लिए हमें कष्ट उठाना पड़े।


अपने कर्मों के प्रति सचेत रहो:

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

अर्थ: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में ही है, फल की कभी चिंता मत करो। कर्मफल की इच्छा से प्रेरित होकर काम करने से बचें और न ही कर्म में आसक्त रहें।

यह श्लोक हमें अपने कर्मों के प्रति सचेत रहने का संदेश देता है. हमें अपने कर्मों को ईमानदारी और निष्ठा से करना चाहिए और फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।


शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करो:

ऊँ शांति: शांति: शांति:।।
अर्थ: शांति, शांति, शांति।

यह श्लोक हमें शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करने का संदेश देता है. हमें हमेशा शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ताकि हम सभी सुखी और समृद्ध रह सकें।


ईश्वर पर भरोसा रखो:

विश्वस्य सर्जकः पुरुषः सर्वात्मभूतः।
भगवान् सर्वभूतानां हृदि सन्निविष्ट:।।

अर्थ: विश्व का सर्जक पुरुष, सभी प्राणियों का आत्मा, भगवान सभी प्राणियों के हृदय में स्थित है।

यह श्लोक हमें ईश्वर पर भरोसा रखने का संदेश देता है. हमें ईश्वर पर भरोसा रखना चाहिए और अपने जीवन में हर कदम पर उसका मार्गदर्शन लेना चाहिए।

Bhagavad Gita Quotes in Hindi with Meaning

यहां आपके लिए Bhagavad Gita Quotes in Hindi से और प्रेरक श्लोक, साथ में सार:

जो हुआ उस पर पछतावा और जो होगा उसकी चिंता मत करो:

नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहन्ति अग्नय
नैनं चर्मणि वायु: स्रोत: अपुनन्ति च।।

सार: अतीत को बदल नहीं सकते, उस पर पछतावा व्यर्थ है. वर्तमान पर ध्यान दो और सकारात्मक कर्म करके भविष्य को उज्जवल बनाओ.


दुःख सुख आते जाते रहते हैं, सम रहो:

गतसंगसक्त: तन्निष्ठ: स्वतंत्र: कर्मणि योगी।
परापरान्न: मुने: चिन्त्यस्त्रिकालदर्शि विगतामिश:।।

सार: जीवन में सुख-दुःख आते जाते रहते हैं. किसी भी परिस्थिति में अपना संतुलन खोना मत. शांत रह कर कर्म करते रहो.


अपने आपको पाओ:

न जायते म्रियते वा कदाचित् न्यबं न चिन्रती।
अजीर्णोऽच्युत: शाश्वतो धर्मसन्तान्य:।

सार: हम नश्वर शरीर से परे एक आत्मा हैं. आत्मज्ञान प्राप्त करो और जीवन की समस्याओं से ऊपर उठ कर शांति पाओ.


हर प्राणी में ईश्वर का अंश देखो:

सर्वभूतात्मता पंञ्चमं बुद्धिवैज्ञानिकं यथा।
सर्वात्मभावेन योग: कौशलं च क्रियाविधि।।

सार: सभी प्राणियों में ईश्वर का अंश है. उनसे दया और करुणा से पेश आओ, यही सच्चा कर्म है.


ईश्वर की इच्छा पर भरोसा रखो:

मायया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्त निरीक्षणम्।
यत्र नारायण: स्वयं भगवान्: पश्यति सर्वभूतानि।।

सार: सब कुछ ईश्वर की इच्छा पर होता है. उसपर भरोसा रखो और अपना कर्म निष्ठा से करते रहो. भगवान तुम्हारा मार्गदर्शन करेंगे.


ये श्लोक हमें जीवन के विभिन्न पहलुओं पर मार्गदर्शन देते हैं. उन्हें अपनाकर हम एक सार्थक और सुखी जीवन जी सकते हैं.

Bhagavad Gita Quotes in Hindi for Students

विद्या विनयानवर्के भूषणं सर्ववर्णेषु। ज्ञानं यथार्हं च यस्य स नित्यं पूज्योऽस्ति सर्वत्र।।

सार: ज्ञान और विनम्रता सभी वर्णों को सुशोभित करती है। जिसके पास योग्य ज्ञान है, वह हर जगह सम्मानित होता है।

छात्रों के लिए अर्थ: शिक्षा और विनम्रता को अपनाओ. जो कुछ सीखो, उसे ईमानदारी से सीखो और उस ज्ञान का सदुपयोग करो. ऐसा करने से तुम हर जगह सम्मान पाओगे।


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

सार: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, फल की कभी चिंता मत करो। कर्मफल की इच्छा से प्रेरित होकर काम करने से बचो और न ही कर्म में आसक्त रहो।

छात्रों के लिए अर्थ: अपना पूरा ध्यान पढ़ाई पर लगाओ और ईमानदारी से मेहनत करो. अच्छे अंकों या सफलता की चिंता मत करो. बस अपना सर्वश्रेष्ठ दो और जो हो, उसे स्वीकार करो।


नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहन्ति अग्नय: नैनं चर्मणि वायु: स्रोत: अपुनन्ति च।।

सार: इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न वायु सुखा सकती है और न पानी गला सकती है।

छात्रों के लिए अर्थ: परीक्षा, असफलता या जीवन की चुनौतियों से घबराओ मत. तुम्हारी आत्मा अजेय है. हार-जीत का खेल है, जो कुछ हो, उसका सामना दृढ़ता से करो और आगे बढ़ते रहो।


न जायते म्रियते वा कदाचित् न्यबं न चिन्रती। अजीर्णोऽच्युत: शाश्वतो धर्मसन्तान्य:।।

सार: यह आत्मा न कभी जन्म लेती है और न कभी मरती है, न बढ़ती है और न घटती है। यह जन्मरहित, अविनाशी, सनातन और धर्म को कायम रखने वाली है।

छात्रों के लिए अर्थ: तुम सिर्फ शरीर नहीं, अपितु एक नश्वर आत्मा हो. तूम्हें असफलता की निराशा और सफलता का अभिमान, दोनों से ऊपर उठना है. अपना असली लक्ष्य आत्मज्ञान प्राप्त करना है।


अपणो मोह तजोऽभेदं धर्माव्याधित शान्तितः। तन्निवृत्तिरेष कायो यत्र चित्ताद्रिष्टिगं सुखम्।।

सार: अपनापन त्याग करो, भेदभाव मिटाओ, धर्म में रोग से मुक्त होकर शांतचित्त रहो। वही वास्तविक शरीर है, जहां चित्त की दृष्टि सुख में टिकी रहती है।

छात्रों के लिए अर्थ: अपने अहंकार और स्वार्थ को त्याग करो. सभी के साथ समान व्यवहार करो और अपने कर्तव्य पर ध्यान दो. यही सच्चा सुख है।

ये कुछ श्रीमद् भगवद् गीता के ऐसे Bhagavad Gita Quotes in Hindi श्लोक हैं जो आप छात्रों के लिए प्रेरणादायक और मार्गदर्शक पाएंगे। ये उन्हें कठिन परिश्रम, ईमानदारी, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प के साथ अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने की प्रेरणा दे सकते हैं।


पराक्रमे च नियते यीते शौर्ये च धृतिधीमतौ। यस्य ते हेमन्ति दैवा यथा कर्मफलान्यतः।।

सार: जिसके पराक्रम में, संयम में, चित्त की स्थिरता में, धैर्य और बुद्धि में देवता भी उसके कर्म के फल को नष्ट नहीं कर सकते।

छात्रों के लिए अर्थ: मेहनत से पढ़ाई करो, संयमित रहो, ध्यान केंद्रित करो, धैर्य और बुद्धिमानी से काम लो. तब कोई चुनौती तुम्हारा रास्ता नहीं रोक सकती।


लोकेऽस्मिन् दृष्टिमारूढ्य न तूर्वमुहतात्मा भवेत्। असिष्यन्नपि दृष्ट्रा सुखं दुःखं न विग्लानी भवेत्।।

सार: इस संसार में स्थित मन वाला दृष्टिमारूढ (विवेकी) होता है। वह न पूर्व की बातों से विचलित होता है और न ही सुख-दुःख देखकर विचलित होता है।

छात्रों के लिए अर्थ: भूतकाल की चिंता या भविष्य की आशंका मत करो. वर्तमान में जीयो और अपना सर्वश्रेष्ठ दो. सफलता या असफलता से विचलित मत हो, अपनी यात्रा जारी रखो।


कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोऽस्त्वकर्मणि।।

सार: तुम्हारा अधिकार कर्म करने में है, फल की कभी चिंता मत करो। कर्मफल की इच्छा से प्रेरित होकर काम करने से बचो और न ही कर्म में आसक्त रहो।

छात्रों के लिए अर्थ: पढ़ाई पर ध्यान दो, नतीजों के बारे में सोचते मत रहो. ईमानदारी से प्रयास करो और जो मिले उसे स्वीकार करो. आसक्ति छोड़ो और अपनी यात्रा पर आगे बढ़ो।


अयुक्तः कर्मफलकामा श्रेय: पार्थ मित्तरब्रिम्हण:। हिरण्मयेषु कलशेषु सुवर्णमय च पित्तरोऽशुचि:।।

सार: अयोग्य, बिना ज्ञान वाला कर्म करने वाला फल की इच्छा रखने वाला पार्थ! वह सोने के बर्तन में मल के समान है।

छात्रों के लिए अर्थ: बिना समझे पढ़ाई मत करो. जो सीखो, उसे समझो और उसका सही इस्तेमाल करो. ज्ञान के बिना सफलता का मतलब नहीं होता।


तत्रापि च पतितो भवन्न्यात्स्ये माग्गि मुनिस्ततः। चान्द्रायणं व्रतं चरेत्पुन: स्वर्गार्घं निरंकुश:।।

सार: वहाँ गिरने पर भी मुनि उस माग में ही गिर पड़ता है। फिर वह स्वर्ग की कामना के बिना चान्द्रायण व्रत करता है।

छात्रों के लिए अर्थ: अगर हार हो भी जाए तो निराश मत हो. फिर से मेहनत करना शुरू करो. हार एक सीख है, इससे तुम और मजबूत बनोगे।

ये कुछ और प्रेरणादायक श्लोक श्रीमद् भगवद् गीता से हैं, जो आपको जीवन में हर मोड़ पर राह दिखा सकते हैं।

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Conclusion – Bhagavad Gita Quotes in Hindi

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